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الموت .. وفلسفة الموت

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في  هذا  البحث   يلزم  التفريق   بين   الموت   وبين  فلسفة  الموت ،  وذلك   التفريق  هو إجرائي  وإحترازي  من جهة  الموضوع  ، و لما  لذلك  من أهمية  للتعريف والتعرف  على  ماهو  طبيعي   و ماهو فلسفي ،  ولأنه  كذلك  فالموضوع   يحتاج  للمزيد   من  الحرص  والكياسة  والحيطة   والحذر   ،   ذلك  إن كثيراً   من  هذه  الموضوعات  و البحوث  إفتراضية  ويغلب عليها الجانب  الظني الإحتمالي  ، ولهذا قد ترجح  هذا الطرف  على  ذاك  معتمدة على ما هو غالب لديها   ،   ومن جهتنا  نحن  : –  سنعمل  وفق آلية  نرجوا  أن نجد  فيها  الموازنة  ما أستطعنا  إلى ذلك  سبيلا  ،   وهدفنا من هذا كله تلمس الحقيقة ونشدانها  والإحاطة بهذا الموضوع الشائك الجدلي      
   ونقول  :   يندرج  هذا   الموضوع   من الناحية الفعلية ضمن قوانين  الوجود  والعدم       ،   و أما  من الناحية الفلسفية  فيخضع لمبادئ العلة  والمعلول  وقوانينهما    ،  وقد أورد   الكتاب المجيد  ذلك   في هذا الإطار العام   ،  حين  جعل من   الموت   مادة  مخلوقة     خاضعة لقوانين   العلة والمعلول  كما   هي  الحياة     ،  وهذا يكون بإعتبارهما  من  الوجودات   الموضوعية    التي  خلقت   لسبب  ما   ودلت   على معنى  ما   .
    قال  تعالى  :  -(  الذي خلق الموت والحياة ليبلوكم أيكم أحسن  عملا   )  –  الملك  2     ،   يبادرنا  هذا النص  في الجواب  عن علة الخلق وسببه   ،  طارحاً الموضوع   ضمن   جدلية  البلاء  وحسن  العمل        ،   وهذا الطرح   الميكانيكي   هو  إدخال في التجربة  من غير إرادة     ،  فالإستدراك  بالتعليل    في  صيغة   الإستفهام     –     أيكم  أحسن عملا –   ،   قيل  في شأنه  جملة  أقوال    منها  :
أولاً   :   أن  يكون   معنى  الإبتلاء  هو  في  إختيار  ( أحسن العمل )   مع وجود  ما يناقضه            .
وثانياً    :  أن يكون  معنى   الإبتلاء   متعلق  في أصل  التجربة وفي طبيعتها وفي كيفيتها  وفي  – تحديد نوع العمل  –         .
يؤكد  هذا   :   إنه   قدم  الموت  على الحياة   في الخلق   ،   ليكون  ذلك   التقديم   بمثابة   الضاغط  النفسي   ليدفع  بإتجاه    أحسن العمل   ،   بدلالة   أنه   قد  جعل   من  الموت  هو  الدليل الدال   على صحة التجربة   ،  وخالف في ذلك  أخرين بقولهم    :   –  إنما    المُراد   من   ذلك  التقديم   للأهميته   ولتوجيه الأنظار  للعناية  بما يكون عليه  الحال في   –  عالم الغيب والشهادة  –  ،    بإعتباره  المحطة التي ينتهي   إليها  المرء وعمله    .
   قال تعالى  :  – (   إن الموت الذي تفرون منه فإنه ملاقيكم  ثم تردون إلى عالم الغيب والشهادة   …)  –  الجمعة 8   ،   ينقسم  الفعل  في  هذا   النص   إلى قسمين   :
الأول   :   هو  الفرار من  الموت   ،  والفرار  من  فعل  –   فر يفر  فراراً  –   ،  وقد  جاء وصفاً  للحال  على نحو الإستعارة من شدة الخوف  من المجهول  (  أي  إنكم  تفرون  من  الموت بإعتباره  مجهولاً  أو غيباً    )   ،  والفرار صفة  موصولة  تدل على الهروب  على نحو دائريا  وليس مستقيماً   ،   أي الهروب مع المراوغة  وذلك يكون   مع  الخوف والقلق وعدم الإستقرار والإطمئنان   ،   والنص  أعترف   بان  الهروب  وعلى  أي  نحو  كان   لا ينجي  من الموت  .
والثاني  :  مفهوم ومعنى الموت الذي تفرون منه ،     على نحو الحقيقة المطلقة  إمضاءاً وتقريراً   قال        –  فإنه  ملاقيكم  –  ،  والأصل فيه  من الفعل  الرباعي  –  لقاء –  ،   والذي يكون بمعنى  الجمع أو الإجتماع ومنه المُلاقاة   ،   وجملة –  فإنه ملاقيكم  –  وردت في مقام  البيان  لتأكيد   اللقاء  ،  وذلك يكون  بضميمة  وجود الشرط   المقرون   مع   الفاء     ،  و يكون  معناه  : –  إن  الموت  الذي تفرون منه   فإنه  ملاقيكم   –   حتماً  وطبيعةً  ،  وبأنه  حاصل  على كل  حال    ،  قيل  :  والجملة  وردت   على نحو   المبالغة في تأكيد الفعل    .
   قال  تعالى :  -(  يدرككم  الموت ولو كنتم  في  بروج مشيدة )  – النساء 78   –  ،     فعل  –  يدرككم   –   هو  من  الإدراك –  ومعناه  اللحوق  أو البلوغ أو  النيل    ،   وهو في  الجملة  ورد  في سياق  التمكن  على كل نحو  ،    وضمير الجمع  فيه   يعود على الموت    ،  أي  إن الموت يلحق بكم   ولو  تحصنتم  ببروج  محكمة  البناء  ،  وهذه إشارة  على أن  التحصن من الموت  لا يمنعه  ومهما كانت  الحصون والموانع   ،   لأن  الموت  واقع بهم على كل حال   ،  ولا يصح  التخفي خشية الموت أو الفرار منه والهروب  ،  فالتخفي  على هذا النحو  مظنة باطلة     
….. 
قال تعالى :  –  (  كل نفس  ذائقة  الموت  )  –  آل عمران  185   ،   هذا  النص  وبهذه   الصيغة   هو  تقرير  وإمضاء   بأن  كل  نفس  حية  ستموت  أو تذوق  الموت      ،   والموت  في  لسان  العرب هو نقيض للحياة    ،  وهو  في الإصطلاح    :  –   مفارقة   الروح  للبدن  –    ،   ولكن  هذا المعنى الإصطلاحي   لم يُشر  إليه  الكتاب المجيد      بل   ذكر شيئاً  أخر ،  بقوله  : –  إنما   الموت   ما يقع على النفس  –   ،  وليس ما يقع على الروح    !!  ،  و الموت  هو  صفة  للشيء  أي ما يقع  على ذلك  الشيء  ، أي إنه صفة للفعل الذي يقع  على البدن       ، والصفة  والفعل   إنما  تعبران هنا  عن الموت بإعتباره  حتمية طبيعية  ملازمة   لكل  نفس  حية  .
   ولكن  ماذا يعني قوله     –   كل نفس   ذائقة  الموت   –   ؟     ،  والجواب  :    إن  حرف   الجمع  –   كل  –    ليس  فيه   دلالة  على الإستثناء  بل هي شاملة للجمع  والجميع     ،  فيقع  في دائرة ذلك  الحرف كل فرد حي  و كل جماعة حية     ،   وإضافة   –  نفس  –   المُنكرة  لهذا   دليل  على ما نحن بصدده    .
  فالنفس  :    بحسب التعريف العلمي لها    تعني   (     الدم أو دم القلب    )     ،   والنص  حين يقول   –  كل نفس  ذائقة  الموت   –    فهو يعني  :  –  إن الموت   يقع  على هذا الدم  الذي هو  النفس ،   أي إن  الموت   يقع على   البدن  والجسد  وليس   على  الروح    –       ،  والذي يتذوق  الموت إنما   هو  البدن  ،  وقد أستخدم لفظ النفس مجازاً أو وصفاً  وكناية   عن البدن     .
  و على هذا  الإعتبار   : –  فالموت  إنما  يقع  على كل   حي  مادي  ذي نفس    –      ،  والنفس  بحسب التعريف العلمي  لها عبارة عن   مادة      ،   إذن  فالموت   إنما  يقع على هذه المادة    أو  (  هي من تتذوقه  )     ،  لذلك  أخبرنا النص بان النفس  أو كل نفس    –  ذائقة  الموت   –  أخبار  عن طبيعة الموت  وماهيته    ،     وذائقة  من  فعل   –  ذاق  يذوق  ذوقاً    فهي ذائقة   –   ،  مما   يوحي  لنا   بأن  طبيعة  المذاق يتعلق بطبيعة حال المتذوق   ،  فتذوق  الطعام  مثلاً   يبين   ماهيته  وصلاحيته   !!    ،    كذلك يكون  طعم  الموت   بالنسبة للنفس الميتة   دالُ على  طبيعة الميت  وما كان عليه في الحياة  الدنيا    ،   ثم   ما  يؤول إليه  وينتهي   من سعادة أو شقاء  وجنة أو نار     ،  وقيل  في الفلسفة   :   إن  ماهية  كل  شيء تكون  من  جنسه  و من طبيعته    ،  إن كان حسناً فحسنا  وإن كان سيئاً فسيئا .
ونعود   لبيان  التعريف   المتقدم   و القائل  بأن  الموت  :    –  هو مفارقة   الروح    للبدن    –   ،   قد يُفهم منه لأول   وهلة  إنه على النقيض   لما  ورد  في   النص  المتقدم    ،   وبان الموت إنما يقع على النفس   ،  وبما  إن الكتاب  لم يأت على ذكر  الروح  ولم يقل إنها   هي من يقع عليها الموت  !!    ،  وإذا لم يكن   من تناقض في البين  :
فهل   الروح   هي   النفس     ؟  ،  أم إنهما  طبيعتان  وماهيتان  مختلفتان   ؟   ،    فالروح   بحسب  الوصف القرآني  جاءت  على هذا  النحو    ،  قال    : – (   يسألونك عن الروح  قل الروح من أمر ربي  )  –  الإسراء 85   ،  ولم  يبين  لنا   جدل   ( مقول القول  والقول  )  وهل إنهما من جهة  المفهوم واحد أو واحدة    ؟    ،   فالنص في سورة الإسراء  لم  ينف العلم   بالروح  ،   ولم يقل إنها غير معلومة أو إنها من الغيب   ،    بل قال  هي   : – من أمر ربي    –   ،  وإذا أستدرجنا   مفهوم ومعنى  –  أمر  ربي  –   ، فإن ذلك الإستدراج    يحيلنا  إلى موضوعة  العوالم  والتي منها  ( عالم  الأمر )     ،   وعالم الأمر  في الكتاب المجيد  هو  عالم مادي     ،   وهذا  يعني   إن  (  الروح  )  وبإعتبارها   من هذا العالم   فيجب ان تكون    مادة   كذلك   ،   وقد  عبر الكتاب المجيد  في مواضع  كثيرة  عن الروح  بإعتبارها     (  نفخة )   أو هي كذلك  ،   والتي بها   ومن خلالها   تتحرك  المادة  وتدور   ،    [  فتكون النفخة  المُشار إليها   بمثابة  الطاقة   التي بها   تتحرك النفس ]     ،  وحين نصف الروح   بالطاقة التي تتحرك بها النفس ،  فهذا يلزمنا للقول  بكونها  مادة  أو هكذا يقول  علماء الفيزياء  : –  (  إن  كل طاقة هي مادة  )   –  . 
فيكون  قوله  تعالى : – (  فنفخنا فيه من روحنا )  – التحريم 12 .
وكذلك  قوله  تعالى : – (  فنفخنا  فيها من روحنا ) – الأنبياء  91 .
   إنما يعبر  عن  ذلك الذي أشرنا إليه   ،   وبسبب هذا الإيضاح   لا يصح  جعل  النفس  منفصلة  من جهة الحيوية عن الروح     ،  بل العلاقة  بينهما  علاقة تبادلية   ،  فالروح   لا  تكون   فاعلة  إلاَّ  في النفس  ،  والنفس لا تكون منفعلة إلاَّ بالروح    .
   ولكن ما معنى  ذلك  التعريف الذي مر بنا   للنفس والقائل   إنها   : –   الدم أو دم القلب  –  ؟     ،   والجواب يكون    :   إن النفس بصيغتها  العامة  إنما  تمثل  كل هذا البدن بأجهزته  وأعضاءه   ،   والدم  هو هذا   الشيء المادي الذي يحمل جميع المورثات والجينات   التي  تكون   في البدن    ،   والذي  يُحرك  هذا  الدم في  البدن  أو له القدرة على ذلك   هي الروح بإعتبارها  الطاقة  أو النفخة التي يتحرك  بها  البدن            .
   وذهب نفر  من أهل الظاهر  للقول :  بان  المراد    من  النفس  ليس  ماهيتها   بل نوعيتها   ،  وهم يعنون  بذلك  ( النوع  )  من  الكائن الحي  و  الذي  يقع عليه الموت  ،  وفي  ذلك  هم   يشيرون  إلى أن  النفس بهذا السياق  تعني  النوع العددي  والكمي    في مقابل  النوع   الفلسفي  المتقدم   ،   ويفهم  هذا  عندهم  في صيغة  المُشار   والمُشار  إليه   ،  بحيث  تعني  عبارة  ( كل  نفس )   كل  كائن  حي   مفرد  ،   وهذا النوع من الوصف  هو الذي  يقع عليه  الموت   ،  وبذلك  هم  لا يميزون  بين  ماهية  الروح  وطبيعتها   وبين  ماهية  النفس  وطبيعتها   بإعتبارهما جنس لنوع واحد         ،   فالموت  الذي  يقع على النفس   يقع  كذلك على الروح من هذه الوجهة       .
  وأستخدم   بعض  العلماء    :  –  كلمة  (  نفس  )  في   مواضع  معينة   قالوا إنها  تصح  معها   و لا تصح  مع غيرها    –   ،  كذلك فعل    أهل الظاهر  حين عرفوا  النفس والروح   من غير تمييز     ، وعدم التمييز   بين الروح والنفس   لا يصح   أطلاقاً  وليس مطلقاً    ،    بمعنى    :  –  إن  ما يقع   عليه الموت   يصبح عدماً  ولا تصح في شأنه  القيامة والحياة مجدداً  –   ،  وهذا  ما  لا يصح  على الروح  إطلاقاً     ،   لأن الموت  لا يقع  عليها  أبداً         .
قال  نفرمن أهل الباطن     :  –  ان  الروح   تولد   من   ( عالم  الغيب )   وإليه  تعود   بعد الموت   –   ،   وقد أستدلوا على ذلك  من قوله تعالى     –   ثم تردون إلى  عالم  الغيب  –  الجمعة 8  ،   وصحح  هذا الإستدلال  أهل الكشف  على أساس   ماورد  عندهم   في بعض المأثور  من القول    :  –   كنا  أنواراً قبل  ان  تخلق السماوات والأرض –     .
   وفي الجملة يكون معنى   –  مفارقة الروح للبدن  –   فيه نفي وإثبات من وجه  ،  أي  نفي حياة النفس بعد الموت  وإثبات الحياة للروح  على نحو الشعور والتخيل   كالذي كان في الحياة  الدنيا  مع البدن  بعد الموت   من غير مادة   ،   وهذا  هو الإمكان  الحقيقي  عند  الشيخ الرئيس  ،  من جهة  ما يرآه المرء في أحلامه عند النوم   ،  فالرؤية  هذه   هو  شعور وإحساس  بالأشياء مجرد ،  وتكون على هيئة تخيل وتصور ليس إلاَّ   ،  هو أحساس  إيحائي  يتصوره المرء حقيقة  كما لو كان  في عالم الوجود والحياة المادية    ،  قال :   وما يرآه الرائي   في منامه هو عينه مايرآه الميت بعد موته  ،  على نحو يكون معه  –  كما  لو كان  موجودا  بالفعل في عالم الدنيا   –        .
ويؤكد  لنا علماء الأحياء الطبيعية    : –     بان  البدن  في الغالب  يتحول   إلى  تراب  بعد  الموت    –  ،   وإلى ذلك يُنسب  هذا  إلى  كلام  قديم  للإمام علي بن أبي طالب  ،  وهو ما  يعيدنا  للإستدراك التالي    :  –  وبإن  السعادة والشقاء   مفاهيم نسبية تصورية ،  ترمزان  لمعنى الجنة والنار  وعلى نحو ما  ،  و  كما  أشار  إلى ذلك    الكتاب المجيد    –    ،  وإذا  كان ذلك كذلك   فلا يصح  أبداً  إعتبارهما  وجودان  موضوعيان  ماديان     ،  وهذا  ما يفسر لنا رؤية  الشيخ الرئيس وما ذهب إليه   :   فالذي   يشعر به  المرء بعد  الموت  هو شعور روحي  لا جسدي     ،  أي   إن  عالم ما بعد الموت هو عالم روحي  بأمتياز   ،  ولذلك  جاءت التسمية منه تعالى منسجمة مع هذا المعنى  وليست  ببعيدة عنه   ،  وإلى هذا المعنى أشار  بعض أهل  الكلام   بقولهم : –  وإنما البعث للأرواح  لا للاجساد   يوم القيامة      –    ،   وإلى ذلك ذهب  بعض المفسرين للقول  بان     –  البعث  يكون  على الشيء  الموجود بالفعل  وليس  للشيء  الذي سيوجد  لاحقاً    –      .. 
قال شيخنا  الأستاذ  أعلى الله مقامه    : –  إنما الموت هو  النوم العميق  المفارق –     ،  وعبارته  مشعرة  بان  ما يحصل  للنائم   في حال النوم  ،  من الهم والحزن والفرح والسعادة ،   يماثله  الموت  من جهة المقاربة الذهنية  ،  ولهذا قيل  :  وإنما قيامة المرء  فعند موته  تكون    ،  فالمشاعر والأحاسيس  تحصل للروح   لا للبدن      ،  وهذا لا يتعارض  مع   قوله  تعالى   : – (  كلما نضجت جلودهم بدلناهم جلودا غيرها ) –  النساء 56   ،   أي  إن  المتعلق  بالعذاب هو الأداة  المؤدية إلى ذلك   ،  وبما إن  الجلد   هو  مركز  الأحاسيس  والشعور  ،  لذلك قال  :  إن الشعور  بالألم   سيستمر  بدليل  تبديل أداة الشعور   ،   وليس  المُراد  هو  الجلد  بما هو هو  ،   وإنما ذكره  النص  من باب تقريب المعنى إلى الذهن لا غير   ،   ووجاهة هذا الأستدلال   تؤكد  لنا   ما نحن بصدده من  القول  ببقاء الروح وإندثار البدن وفنائه   .
  
قال  تعالى  : –  (  يا أيتها النفس المطمئنة ،  أرجعي إلى ربك راضية مرضية )  –   الفجر 27  ،   حرف النداء   مع الوصف  مشعر  بأهمية  الموصوف  به  ،   وقد مر بنا  تعريف  النفس على نحو عام  فلا نعيد   ،  وإضافة الإطمئنان  إليها  هو من باب  التحقق  من  المعرفة واليقين  ،  ولا يكون  ذلك  متوفراً  للجميع   ،  بل هو للصفوة  من الذين  يتصفون بذلك   ،   وقيل  :  إنها  الكيان  العام  الذي شمله الخطاب  النبوي  والرسولي   ،  وهو  من تلقى  ذلك  فوعاه   كتعاليم ودروس ومعرفة من قبل الرب المعلم   ،  فوثق بها وعرفها وأطمئن  لها   ،  والظن الغالب  عندي  إن تلك  العلوم و المفاهيم  صعبة  المنال من جهة ،  ومصاديقها نادرة من بني البشر هذا إن أستثنينا   الأنبياء والرسل  والصديقين    ،   ومثالنا  يكون دائماً  الإمام علي الذي  قال    : –  والله لوكُشف ليَّ الغطاء ما أزددت يقينا –  ،  والقسم على المقسوم دليل المعرفة والإيمان  واليقين  ،  وهذا ما  لا يتطلب معه   رؤية الحقايق الغيبية لكي يؤمن بها أو يثق بصحتها  ،  وهذه  الفئة  من الناس  نادرة الوجود   ،  وهي عندها  يكون  كل شيء بالنسبة   واضحا معلوما  ،  وهذه المعرفة  عينها  وجدناها  ولكن بصيغة  مختلفة  لدى الإمام الحسين في   إني  : –  لا أرى الموت إلاَّ سعادة والحياة مع الظالمين إلاَّ برما –  ،  هذه  هي الشخصية  الواثقة المطمئنة  العارفة   معنى  الحياة  و معنى الموت وما يصير إليه الواثقين بربهم      ،    وهذا النص  يجعلنا نتوقف ولا نستعجل  في إدراك  معناه  ومادته  التي عبر عنها    . 
 ونقول    :   هل يجوز  وصف كل مسلم  أو مؤمن  بهذا الوصف عند الموت ؟   .
والجواب  :  لا يجوز   مطلقاً   لجهة كون النص  قد  ورد في مقام بيان  الحقيقة المطلقة ،  والتي لا يصح معها المجاز أو الإستعارة    ،  والذي نرجحه  في هذا المقام  الأستئناس  باقوال أخر  من قبيل ، قوله  تعالى  : –  كل من عليها فان –  أو –  كل نفس ذائقة الموت  –  وأمثالهما  تلافياً  للحرج  في دقة الوصف والتعريف   ، وحسبنا  في هذا  الشأن  قوله تعالى   –  إنا لله وإنا إليه راجعون –  المجزيء  إنشاء الله  في كل  حال  ،  والدال على معناه مع الضرورة   ،   ولا يقع جوابنا  هذا  دفعا  للحرج  كما قد يتوهم  البعض من أهل العلم .
وخلاصة الكلام :
 قوله  تعالى :  –  (   ونفس  وما  سوآها  .  فألهمها  فجورها وتقوآها  )  –  الشمس  7 و 8   ،  ظاهر  النص  يوحي ويكأنه  جاء إلحاقاً  للنص المتقدم  ،  في وصف  النفس  وهنا  جاء الكلام  عن التسوية لا عن الخلق  ، والتسوية  فعل لا حق  جاء  في سياق موضوعة  التربية  والتعليم   ،  أي إن في مدرج  التربية  والتعليم  هناك ضبط وهناك فوضى ،  فالضبط يؤدي إلى التقوى والحصانة  والفوضى تؤدي إلى الفساد  والفجور  ،  ولا يتعلق الفعل  بالتكوين  إنما هو في بيان  منصات التشريع ولوازمه   ،  أي إن الإنسان وبعد أن يتعلم   أو يهتدي  لمعنى الصواب ومعنى الخطأ  ،  يتُرك ليتخذ  القرار بمفرده   ،  ليكون بذلك مسؤولاً عما أتخذه  من موقف أو حكم ،  ولا يصح إدخال موضوعة النص في باب ماهو كلامي من البحوث  .
 
آية الله الشيخ إياد الركابي

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